Monday, September 14, 2009

हिंदी दिवस

तुम भूले हम भूले,हिंदी को हम सब है भूले|
हिंदी का करे सम्मान,इसी में है देश का मान |

Thursday, August 27, 2009

बम विस्फोट के बाद

बम बिस्फोट के बाद-
सहानुभूति के दो बोल मात्र,
घायल और मारे जाने की कीमत-
पचास,साठ हजार रूपए,या
एक डेढ़ लाख रूपए|
अस्पताल में घायलों और सम्बधियों के बीच-
शहद से मीठे दो बोल -
मंत्री और संतरी हाथ जोड़े हुए|
सबकी पीठ सहलायेगे|
दूसरे दिन सबेरे बडा सा फोटो अख़बार में छप जायेगा|
बैठक बुलाई जायेगी|
सुरक्षा-व्यवस्था कड़ी कर दी जायेगी|
सुंदर पन्नो पर योजनाये सजायी जायेगी|
फिर किसी शहर, गली महोल्ला,बाजार में-
बम विस्फोट की खबर आएगी|
फिर यही सरकार की रणनीति दोहराई जायेगी |
कोरी सहानुभूति जताई जायेगी|

Tuesday, August 25, 2009

दिल्ली दिल में झाख

हम दिल्लीवासी दिल्ली को पेरिस बनाने का सपना देखते हैं,लेकिन अपने घरो के पास जमा पानी,जिसमे तमाम मच्छर हो रहे हो वो नहीं देखते न ही इधर उधर कूड़ा फेखने से कतराते है| पार्को में अपने कुत्तो को सुबह और शाम का मलत्याग कराते हैं|अपने घरो को साफ करके,दुसरो के घरो के आगे कूड़ा फेकने से नहीं कतराते| सडको पे जहाँ मर्जी आये थूक देते है| अफसोस तो इस बात का है आदमी लोग आज भी दीवारों और कोनो में मूतना अपनी शान समझते है और अपने आप को पढा लिखा समझदार इसान कहते हैं|
यू तो मालो की भरमार ने दिल्ली की शान बढाई है लेकिन इन मालो की वजह से जगह-जगह गंदगी और पानी की समस्या भी उत्त्पन हुई है| पुलों का जाल इधर उधर बिखर गया है लेकिन भीड़ में कोई कमी नहीं आई है| पुलों के आस पास अभी साफ सफाई का काम बाकी है|
दिल्ली में सरकारी स्कूल का वही हाल है जो आग्रजो के समय हिदुस्तानियों का था| दिल्ली में आग्रेजी बोलने वाला हिंदी बोलने वाले से ज्यादा काबिल समझा जाता है ये मेरा खुद का अनुभव है| हिंदी दिवस के दिन नेता हिंदी को ऐसे याद करते है जैसे विदेश में रहने वाले देश में रहने वाली अपनी माँ को मुसीबत में करते है| अपनी चीज़ को सुधारना के बजाय आज भी आग्रेजो की चीजो की नकल करने से नहीं कतराते|
दिल्ली के निगम स्कूल के हालत एक दम दयनीय है| वहा बच्चो के बेठने की व्यवस्था तक नहीं है| स्कूल की साफ़ सफाई का भी बुरा हाल है|दिल्ली में जगह जगह जो मेट्रो पुल बन रहे है उससे जन सामान्य को सुविधा तो हो रही है लेकिन उससे लोगो परेशानी भी हुई है||
न्यू डेल्ही के रेलवे स्टेशन के पास गंदगी का साम्राज्य इस कद्र फे़ला है पुछो मत| उस ओर हमारे नेताओं का ध्यान इस लिय नहीं जाता क्योकि वहा से कोई विदेशी नेता या नेता नहीं आता| हा जब कभी किसी नेता को आना होता है तो साफ-सफाई कर चुना डाल दिया जाता है ओर सरकारी शोचायलो पर भी तभी ध्यान दिया जाता है| जनसामान्य के लिय कोई विशेस ध्यान नहीं दिया जाता उसे भी अब इन सब चीजो की आदत पड गयी है| अफसोस तो इस बात का है हम सब भी एक जुट होकर इसके लिय कोई शिकायत नहीं करते ना शिकायत करने वाले का साथ देते है|
| पुराने को मिटा कर नया बना देने से दिल्ली का सुधार नहीं होगा, जरूरत है पुराने में सुधार करके उसे सुन्दर और स्वच्छ बनाने की| नयी चीजो के बनने से गंदगी तो फेल रही है, साथ ही पुरानी चीजो का भी बुरा हाल हो रहा है| पता नहीं क्यों दिल्ली सरकार ये सोचती है कि पुलों ओर मेट्रो पुल के बनने से दिल्ली में चार चाँद लग जायेगे उसे ये दिखाई नहीं देता कि जब तक दिल्ली में कार और बाहर से आने वालो पर रोक नहीं होगी तब तक भीड़ पर काबू पाना और दिल्ली का सुधार मुश्किल है| दिल्ली में बाहर से आने पर रोक लगनी जरूरी है यदि इस ओर सरकार ध्यान नहीं देती है तो वो दिन दूर जब ये कहावत दिल्ली पर सच हो जायेगी चार दिन कि चांदनी फिर अँधेरी रात|
जितना ध्यान सरकार दिल्ली पर देती उसका चोथाई हिस्सा ध्यान अगर आस पास वाले गावो और इलाके पर दे उनको सुविधाए दे वहा भी पुलों और सडको, स्कूल और तकनीकी संस्थाओ का निमार्ण कराये तो भी शायद भीड़ पर काबू पाए|
मॉल से रुपया पैसा कमाया जा सकता है दिल्ली को सुधार नही जा सकता| मॉल बहुत बन गये इन पर रोक लगनी चाहिए और इनकी जगह पार्को और हरे-भरे पेड़ पोधे लगाने चाहिए जो पैसा मॉल पर सरकार खर्च कर रही है उसे सरकारी स्कूल और निगम स्कूल पर खर्च होना चाहिय और दिल्ली की पुरानी चीजो के सुधार में तभी दिल्ली का भला होगा वरना भगवन ही मालिक है|

Friday, July 17, 2009

एक शाम की बात
हर रोज की तरह उस शाम को चाय का कप ले कर अपनी बालकनी में खडी थी| इतने में एक सात-आठ साल का लड़का हाथ में इक भारी बोरी और इक में लकडी के कोयले लिए भाग कर आया और जगह बना कर सडक के किनारे बैठ गया,फिर उसने अपना स्थान साफ किया और तीन ईट रख कर फिर लोहे की जाली में कोयले डालकर उसे जलाया फिर एक गत्ते से उसे तेज हाथो से हवा करने लगा|
कोयले जब ठीक से जलने लगे तो उसने अपने बोरे से भुट्टे निकाल कर उस कोयले की आग में रखने शुरू कर दिए | अब उसने अपने हाथो की हवा और तेज कर दी,उस आग में तीन-चार भुट्टे रख दिए और लगातार हाथो से तेज हवा करता रहा|मैंने अपनी चाय खत्म की और सब्जी भी जो पहले से कटी थी उसे गैस पर रख दी फिर थोड़े से बर्तन धोकर फिर उसी स्थान पर आ गयी और उसी छोटे से लडके को देखने लगी जो अभी भी तेज हाथो से हवा किये जा रहा था और भुट्टे भुने जा रहा था|
धीरे-धीर उसकी मेहनत रंग लायी और उसके भुट्टे बिकने लगे,उसकी ख़ुशी चेहरे से कम हाथो से ज्यादा झलक रही थी, जो लगातार हवा किये जा रहे थे|मुझे पता लगा गया था की भुट्टे पॉँच-सात रूपये से ज्यादा का नहीं है| देखते- देखते उसके भुट्टे बिक गए, मेरी सब्जी भी बन गयी थी, मैंने गैस बंद कर दी फिर उसी स्थान पर आ गयी|
अपने सारे भुट्टे बिकने की ख़ुशी में वो सारा सामान समेट कर, अपनी बोतल से पानी पिया जो गर्म होने पर भी उसे शायद शीतल पेय लग रहा था सारा पानी पी कर झूमता हुआ अपने घर की और चला गया| दुबारा उसी जोश और ख़ुशी के साथ आने के लिए|
मुझे पता हैं वो बिना सुविधा के घर में चैन की नीद सोयेगा,वही दूसरी तरफ सभी सुविधा से सम्पन घरो में कुछ लोग सारी-सारी रात करवट बदल कर काटते है आखिर क्यों?????
धरती का दर्द समझो
हर रोज मुझे खोदा जाता है,
हर रोज मेरे बालो को नोचा जाता है,
मेरे हाथो को तोडा जाता है,
मेरे बच्चे मुझ से छीने जाते है|
हर तरह का जुल्म मुझ पर किया जाता है|
फिर भी मैं तुम सब को देती आई हु|
और दे रही हु |
मेरे छाती में अब और नहीं-
ईट,सरिये ,पत्थर डालो,
कुछ तो ठडक पहुचे छाती में
ऐसा कुछ कर डालो|
बादल बरसे ऊपर से तुम प्रेम-
के बीज डालो,
कुछ करे दया अम्बर और -
कुछ तुम कर डालो|
मेरा दर्द जब हद से ज्यादा,
बढ़ जायेगा फिर कुछ सम्भल नहीं पायेगा |

Monday, April 27, 2009

दोस्ती और प्यार

जिस तरह प्यार की कोई उम्र नहीं होती, उसी तरह दोस्ती की कोई उम्र नहीं होती| हम सब के पास एक दिल होता हैं उस दिल में जज्बात होते हैं पर दोस्ती और प्यार में उस दोस्ती और प्यार की कद्र कोई कोई ही करता हैं| सच्चा प्यार और दोस्ती किसी-किसी को ही मिलती हैं|शादी से पहले मेरी बहुत सी सहेली थी किस्मत से सभी सहेली बहुत अच्छी थी आज भी उन सब की याद मेरे दिल में हैं| एम में मेरे साथ लडके भी थे,पर सब ठीक थे मैं सबसे बात करती थी| स्कूल और कॉलेज का समय सबसे अच्छा होता हैं, इस बात से आप भी सहमत होगे|{ शायद}
दोस्ती
आज दोस्ती के मायने बदल गए हैं कोई किसी का सच्चा दोस्त नहीं, आज कोई किसी से दोस्ती करता हैं तो उसका घर, उसके पास कार हैं या नहीं, उसके पास नौकर हैं,उसकी शक्ल- सूरत कैसी है, दिल के सिवा सब देख कर दोस्ती करते हैं| किसके दिल में कितना प्यार हैं दिल कितना खूबसूरत हैं ये कोई नहीं देखता| आज लड़का और लडकी की दोस्ती जल्दी ही प्यार में बदल जाती है और जल्दी टूट भी जाती है मैंने अपने आस पास देख कर और कुछ समझ कर येही अदाज लगाया हैं जहा तक मैं समझती हु ये सही हैं शायद कुछ की निगाह में सही न हो|
जब भी मैं किसी से दोस्ती करती हु तो उसको अपने बारे में सब सही बताने की कोशिश करती हु अपने घर कि ज्यादा तारीफ नहीं करती न ही अपने पति और बच्चो की, क्योकि मैं सोचती हु झूठ ज्यादा दिन तक छिप नहीं सकता और सच का पता चल जाता है इसलिय सच ही बोलना चाहिए|
शादी के बाद औरते दोस्ती को ज्यादा महत्त्व नहीं देती,वो पति और बच्चो की ही हो कर रह जाती है,हम में से बहुत औरते अपने पति की बातो को ही सच मानती चाहे वो बात झूठ ही क्यों न हो, आज के वक्त में पति को भगवान मान कर आख मुद कर उसकी हर बात को स्वीकार कर लेना शायद सही नहीं हैं लेकिन जो सही हैं वो मनाना ही चाहिए,चाहे वो दोस्त कहे या कोई और| दोस्ती की जरूरत शादी के बाद भी उतनी होती है जितने शादी के पहले, शादी के बाद की दोस्ती में रंग भरना हम औरतो के हाथ में हैं अगर हम दोस्ती को महत्त्व दे तो| अगर हम दोस्ते बनायेगे तो हम ज्यादा खुश रहेगे खुश रहेगे तो बीमारिया भी हमसे दूर रहेगी और हम काम कर पायेगे|
आज हम मोबाईल, टीवी और कंप्यूटर में फस के रह गये हैं इनसे भी दोस्ती करे लेकिन दोस्ती का महत्त्व को भी समझे और दोस्त बनाये|
प्यार
प्यार कभी भी कही भी किसी को भी हो सकता है प्यार सच में प्यार है तो वो कुछ भी नहीं देखता है| अगर देखता है तो सिर्फ दिल,दिल के सिवा प्यार कुछ भी नहीं देखता| आज प्यार के अर्थ बदल गये है लोग प्यार को महत्त्व नहीं देते प्यार को खेलने खाने की चीज समझते है| कुछ जो प्यार को सब समझते है वो मेरी तरह बुद्धू है|
प्यार दिल की वस्तु है दिमाग की नहीं,प्यार दिमाग से सोच कर नहीं किया जाता,प्यार तो दिल को दिल से हो जाता है फिर ना ये जाति देखता है ना धर्म ना रूप ना रंग| प्यार का भी कोई रूप,रंग नहीं है|आज कंप्यूटर,मोबाईल,टीवी की दुनिया ने भी प्यार को प्रभावित किया है| ऐसा में सोचती हु, आप क्या सोचते है?

Sunday, April 12, 2009

बिखरी-छितरी दिल्ली

न जाने दिल्ली का क्या होगा,हर तरफ भीड़ ही भीड़ दिखाई देती हैं,लोग एक दूसरे पर चढ़ने को बेताब रहते हैं| वैसे तो हर तरफ भीड़ का बुरा हाल हैं पर जो हाल मेरी आखो ने देखा हैं वो ही आप लोगो को बताऊगी|चिराग दिल्ली फ्लाई ओवर के पास भीड़ एक दूसरे पर चढ़ने को उत्सुक रहती हैं अगर थोडा ध्यान इधर उधर हुआ सब एक दूसरे पर चढ़ जायगे फिर कुतुबमीनार से ऊची चोटी तेयार हो जायेगी इसमें कोई शक नहीं|
एक कार वाला चाह रहा हैं एक और कार,एक घर वाला चाह रहा हैं एक बडा बागला| किसके इशारे पर बहु-मजिल इमारते पर इमारते बनती जा रही हैं maal per maal बन रहे है, स्वच्छ दिल्ली हरियाली दिल्ली के पेडो का बुरा हाल है, आने वाले समय में सबको पानी बिजली मिले इसकी कोई गारेन्टी नहीं हर पार्टी नेता अपनी छवि सवारने में लगा हैं देश की चिंता नहीं| शिक्षा और शिक्षक का बुरा हाल हैं सब जेब भर रहे हैं दिमाग का हाल खराब हैं सब बिना मकसद के भाग रहे हैं पता नहीं कहाँ जाना हैं|
दिल्ली का सुधार हो रहा हैं या फिर बंटाधार पता ही नहीं चल रहा लोगो को ऐसा लगता हैं| मौल के रूप में सुंदर सी मजिल तो बन जाती हैं पर आस-पास का हाल पूरा हो जाता हैं|आस-पास का हाल सुधार होने में कितना वक्त लगेगा पता नहीं,गरीब-मजदूर को थोड़े दिन का आसरा जरुर मिल जाता हैं उस मॉल के आस -पास जिसमे शायद वो कभी नहीं जा पायेगा|
हम सोच रहे हैं दिल्ली का सुधार हो रहा हैं पर मैं सोच रही हूँ दिल्ली का हाल बुरा हो रहा हैं|{अगर घर में पाच कमरे हो उनमे से एक कमरे को सारी सुविधए देने से पूरा घर सही नहीं हो जाता, मेरे कहने का अर्थ आप समझ गए होगे दिल्ली को पेरिस बना देने से पूरा भारत पेरिस नहीं हो जाता आधे से ज्यादा लोग यहाँ आज भी भूखे हैं| गाँव का खास कर पिछडे इलाके का बुरा हाल हैं| ये बात सारी पार्टिया और नेता जानते हैं जिन्हें चुनाव के समय सब याद आता लेकिन बाद में वही ढाक के तीन पात, सब पन्नो में रह जाता हैं|
हर तरफ से लोग दिल्ली में आ कर बस रहे हैं क्यों? क्या कभी आपने सोचा है दो वक्त की रोटी के लिए, अपने घर छोड़ कर लोग यहाँ आ रहे हैं पार्टियाँ और नेता जानता की सोचते हैं तो गावं का सुधार करे और पिछडे इलाके को सुविधए दे{बिजली और पानी} ताकि गावं का आदमी दिल्ली की और न भागे|
परिवर्तन का अर्थ पुराना को छोड़ना नहीं बल्कि नये के साथ मिल के पुराना को सुधारना हैं, जो शायद दिल्ली में नहीं हो रहा इसिलये यहाँ सुधार तो हो रहा है पर कुछ यहाँ खो भी रहा हैं| हरियाली नाम मात्र की रह गयी हैं,वी. आई. पी. के पास सब है हरियाली और रास्ता भी|
जब कभी दिल्ली में पार्को में जाओ{एक आध को छोड़कर} छोटे-छोटे पेड़ ही ज्यादा नजर आते हैं छायादार पेड़ नहीं| यहाँ एक बात कहना चाहती हु हमारे घर के पास एक बहुत बडा पार्क था जो है भी,1999 में जब हम वहा जाते थे तब वहाँ तमाम नीम के हरे-हरे पेड़ और हरियाली थी और आज वहा सब सुखा-सुखा नज़र आता है वेसे तो सारी दिल्ली सुख रही है जो इलाके हरे-भरे थे वहां भी इमारते पे इमारते बनती जा रही हरियाली खत्म हो रही है पानी का बुरा हाल है| जितने भी माल है उनमे झरने आपको चलते मिल जायेगे,चाहे लोगो नहाने और पीने को पानी न हो|
यहाँ-वहां जहा-तहां मत पूछो, कहाँ-कहाँ हैं पुलों की बहार
दिल्ली हो रही बेकार| दिल्ली हो रही बेकार|
इधर भी खुद रहा उधर भी खुद रहा,
न इधर का पूरा हुआ,न उधर का हुआ|
इमारत बन जाने से,maal per maal बन जाने से
फायद किसको हुआ जेब किसकी भरी,
तुम जानते हो हम भी जानते हैं
पर चुप हैं सब ,कुछ कब मानते हैं|
काम पर जाना और आना
टीवी देखना और सो जाना
अपनी उलझनों में खो जाना
अपने सुख में खो जाना
क्या जिंदगी इसी को कहते हैं|
दिल्ली के लिए दिल से सोचे और हम सब मिल कर कुछ करे तभी दिल्ली का रूप सवरेगा नहीं तो चार दिन के चादनी फिर अधेरी रात वाली बात दिल्ली पर सच हो जायेगी|